SDSU के पंडित ललित मोहन शर्मा परिसर में जीनोमिक्स व मॉलीक्यूलर डायग्नोस्टिक्स पर राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ

ऋषिकेश : पंडित ललित मोहन शर्मा परिसर, ऋषिकेश व तकनीकी सहयोगी डीएनए लैब (CRIS) देहरादून के तत्वावधान में आज 21 से 25 मार्च 2026 तक “New Frontiers in Applied Genomics, Molecular Diagnostics and Advanced Systems in Translational Research in Life Sciences 2026” विषय पर आयोजित होने वाली राष्ट्रीय कार्यशाला व सम्मेलन एवं संकाय विकास कार्यक्रम (FDP) का शुभारंभ हुआ। जिसमे 21 से 23 मार्च तक देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के वक्ताओं के ऑनलाइन माध्यम से व्याख्यान आयोजित होंगे व 24 व 25 मार्च को ऑफलाइन माध्यम से पंडित ललित मोहन शर्मा परिसर, ऋषिकेश के मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी विभाग में प्रशिक्षण कार्यक्रम के साथ सम्मान एवं पोस्टर, ओरल प्रतियोगिता का आयोजित होगी।

उक्त कार्यशाला के प्रथम दिवस ऑनलाइन उद्घाटन सत्र में कार्यशाला अध्यक्ष प्रो. गुलशन कुमार ढींगरा ने सभी प्रतिभागियों व वक्ताओं का स्वागत एवं परिचय किया, उन्होंने कहा कि कुलपति प्रो. एनके जोशी लगातार छठवीं बार आयोजित इस कार्यशाला के लिए आयोजकों को शुभकामनाएं प्रेषित की। परिसर ऋषिकेश के निदेशक प्रो. एमएस रावत विश्वविद्यालय की ओर से सभी का स्वागत करते हुए कहा कि आधुनिक आणविक तकनीकियों से रोगों की पहचान व जांच में तेजी आई है, प्रयोगशालाओं में AI ने बीमारियों की पहचान की गति और सटीकता को नए आयाम दिए हैं।

माइक्रोबायोलॉजिस्ट सोसाइटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. ए.के. देशमुख ने सभी प्रतिभागियों से अनुशासित रूप से सीखने व अपनी क्षमता को विकसित करने पर जोर दिया। इस कार्यशाला व सम्मेलन के समन्वयक व डीएनए लैब के प्रबन्धक निदेशक डॉ. नरोत्तम शर्मा ने कार्यशाला में सभी वक्ताओं का परिचय कराया व 5 दिवसीय कार्यशाला का उदेश्य विस्तारपूरक समझाया।

प्रथम तकनीकी सत्र में एम्स, ऋषिकेश के एडिशनल प्रोफेसर, पैथोलॉजी, डॉ नीलोत्पल चौधरी ने अपने व्याख्यान में कहा कि चिकित्सा विज्ञान में PCR एवं NGS (Next Generation Sequencing) जैसी उन्नत तकनीकों ने बीमारियों के सटीक निदान और उपचार में एक नई क्रांति ला दी है। PCR तकनीक डीएनए की प्रतियों को बढ़ाकर संक्रामक रोग जैसे TB, कोविड, हेपेटाइटिस का सूक्ष्म स्तर पर तुरंत पता लगाने में सक्षम है। NGS तकनीक एक साथ हजारों आनुवंशिक अनुक्रमों को पढ़ सकती है। इसे कैंसर के उत्परिवर्तनों (Mutations) की पहचान और दुर्लभ आनुवंशिक रोगों के विश्लेषण में किया जा रहा है। इन तकनीकों के मेल से न केवल जांच की सटीकता बढ़ी है, बल्कि अब मरीजों को उनकी जेनेटिक बनावट के आधार पर ‘पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट’ देना भी संभव हो गया है।

द्वितीय तकनीकी सत्र में डीएनए लैब की प्रभारी व मैक्स हॉस्पिटल की माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. हीना रोहिला ने कहा कि चिकित्सा निदान (Diagnostics) के क्षेत्र में ऑटोमेशन एक क्रांतिकारी बदलाव लेकर आया है। सूक्ष्मजीव विज्ञान की प्रयोगशालाओं में अब रोबोटिक प्रणालियों और आधुनिक मशीनों के उपयोग से बीमारियों की पहचान पहले से कहीं अधिक सटीक और त्वरित हो गई है, जो कल्चर रिपोर्ट पहले 48-72 घंटों में आती थी, अब ऑटोमेटेड सिस्टम उसे कुछ ही घंटों में तैयार कर देते हैं, एंटीबायोटिक संवेदनशीलता की स्वचालित जांच से मरीजों को सही दवा समय पर मिलना संभव हुआ है। मानवीय हस्तक्षेप कम होने से नमूनों की शुद्धता बनी रहती है।
अंत मे प्रश्नोत्तर सत्र में दोनों वक्ताओं ने प्रतिभागियों के प्रश्नों के सहजतापूर्वक उत्तर दिए। इस कार्यशाला के प्रथम दिन देश के विभिन्न राज्यों से 100 से अधिक प्रतिभागियों ने प्रतिभाग किया।

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