भू-धंसाव को रोकने के कार्यों पर संघर्ष समिति ने उठाए सवाल

गोपेश्वर (चमोली)। जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति ने जोशीमठ नगर में भू-धंसाव को रोकने के लिए चल रहे स्थिरीकरण कार्यों की पारदर्शिता और गुणवत्ता पर सवाल खडा करते हुए कहा कि  इससे जोशीमठ को पटरी पर लाने की व्यवस्था लडखडा जाएगी।

समिति के संयोजक अतुल सती, अध्यक्ष शैलेंद्र पंवार, पूर्व ब्लाॅक प्रमुख प्रकाश रावत, प्रवक्ता कमल रतूड़ी आदि ने  गोपेश्वर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए आरोप लगाया कि स्थिरीकरण कार्यों से जुड़ी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। इससे यह समझना मुश्किल है कि किन तकनीकी उपायों को अपनाया जा रहा है। जल निकासी और सीवरेज व्यवस्था भी विशेषज्ञों की राय के अनुरूप नहीं की जा रही है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में 600 करोड़ रुपये से अधिक के कार्य विभिन्न स्थानों पर संचालित हैं, लेकिन इनके चयन को लेकर स्पष्ट नीति नजर नहीं आती। विष्णुप्रयाग, नरसिंह मंदिर मार्ग, सुनील और मारवाड़ी जैसे क्षेत्रों में कार्य हो रहे हैं, जबकि सिंहधार, मनोहरबाग, गांधीनगर और रविग्राम जैसे अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों को प्राथमिकता से बाहर रखा गया है। इससे स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ रहा है।

समिति ने वैज्ञानिक अध्ययनों और विशेषज्ञों के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि जोशीमठ के नीचे लगभग 80 मीटर गहराई पर ठोस चट्टान (सॉलिड रॉक) मौजूद है। ऐसे में केवल 10-12 मीटर की गहराई तक रॉक बोल्टिंग करना दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इसके अलावा अलकनंदा नदी की दिशा में भूमि के खिसकने की गति बढ़ने की बात भी सामने आई है। यह स्थिति को और गंभीर बनाती है।

वक्ताओं ने कहा कि विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा सेटेलाइट इमेजरी और जमीनी सर्वेक्षण के आधार पर धंसाव की गति में वृद्धि और भविष्य में बड़े खतरे की आशंका जताई गई है। इसके  बावजूद विशेषज्ञों के अध्ययनों को स्थिरीकरण कार्यों की योजना में शामिल नहीं किया जा रहा है। समिति ने इसे धन के दुरुपयोग और दीर्घकालिक खतरे को नजरअंदाज करने जैसा बताया।

पुनर्वास के मुद्दे पर समिति ने आरोप लगाते हुए कहा कि तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रभावित परिवारों के लिए भूमि का मूल्य निर्धारण, मुआवजे की दरें और पुनर्वास की ठोस कार्ययोजना तय नहीं की गई है। इससे हजारों परिवार अनिश्चितता और मानसिक तनाव के बीच जीवनयापन कर रहे हैं। उनका कहना था कि जनवरी 2013 के बाद जोशीमठ की भूगर्भीय और भौगोलिक स्थिति के मध्यनजर वैज्ञानिक अध्ययनों को स्थितिकरण के कार्यों का आधार बनाया जाना चाहिए। जनवरी 2023 में देश के शीर्ष 8 संस्थानों की रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि भविष्य में जोशीमठ की स्थिरीरता को लेकर और अध्ययन/समीक्षा की जरूरत होगी। इसलिए यह जरूरी है कि उच्च स्तरीय कमेटी के माध्यम से सर्वेक्षण/समीक्षा करवाई जानी चाहिए। जोशीमठ नगर की सेना द्वारा अधिग्रहित व कब्जे वाली भूमि का प्रभावित लोगों को मुआवजा दिलाया जाना चाहिए। चेतावनी दी कि

यदि जल्द अतिसंवेदनशील क्षेत्रों के ट्रीटमेंट और पुनर्वास की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई तो प्रभावितों को सड़कों पर उतरने को विवश होना पड़ेगा। 

इस दौरान दीपक टम्टा, सचिन रावत, ऋतिक राणा, कुशलानंद डिमरी आदि मौजूद रहे। इससे पूर्व संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री तथा भारत सरकारी आपदा प्रबंधन मंत्रालय को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपकर प्रभावितों की समस्याओं के निदान की मांग की।

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