शीला समुंद्र पहुंची मां नंदा की बड़ी जात

  • छेड़ी नाग से ज्यूंरागली तक पथरीली चढ़ाई ने ली नंदाभक्तों की अग्निपरीक्षा

गोपेश्वर (चमोली)। हिमालय की खड़ी चट्टानों, पथरीली पगडंडियों और हांफती चढ़ाई ने शनिवार को नंदाभक्तों की कड़ी परीक्षा ली। लेकिन आस्था की डगर पर निकली मां नंदा की बड़ी जात के कदम नहीं थमे। 12 बरस बाद रूपकुंड पहुंची बड़ी जात छेड़ी नाग और ज्यूंरागली की दुर्गम राह पार कर थाला उलारी होते हुए अपने अंतिम रात्रि पड़ाव शिला समुद्र पहुंच गई। साफ मौसम ने भी इस कठिन सफर में श्रद्धालुओं का साथ दिया। शिला समुद्र पहुंचते ही मां नंदा और बंड भूमियाल के जयकारों से उच्च हिमालयी क्षेत्र गूंज उठा।

शनिवार को पातर नौचयनिया से शुरू हुआ सफर भगुवाबासा, छेड़ी नाग, रूपकुंड और ज्यूंरागली की दुरूह चढ़ाई से होकर गुजरा। जगह-जगह बड़े-बड़े पत्थरों के बीच से रास्ता बनाते हुए श्रद्धालु आगे बढ़ते रहे। कहीं पांव रखने की जगह मुश्किल थी तो कहीं खड़ी चढ़ाई सांसें रोक रही थी। इसके बावजूद नंदाभक्तों के कदम कैलाश की ओर बढ़ते रहे। ज्यूंरागली की विकट चढ़ाई पार करने के बाद बड़ी जात थाला उलारी होते हुए देर शाम शिला समुद्र पहुंची। 12 बरस के इंतजार के बाद कैलाश की ओर बढ़ी बड़ी जात अब अपने सबसे कठिन और निर्जन पड़ावों को पार कर रही है। रास्ता जितना विकट है, नंदाभक्तों की आस्था उतनी ही अडिग नजर आ रही है।

ज्यूंरागली में मां नंदा के लिए बंड भूमियाल ने बनाया था रास्ता

बड़ी जात की यात्रा में ज्यूंरागली का पड़ाव विशेष धार्मिक मान्यता रखता है। बंड मंदिर समिति के संरक्षक शंभू प्रसाद, जो चैथी बार बड़ी जात में शामिल हैं, बताते हैं कि मान्यता है कि रूपकुंड से आगे ज्यूंरागली में मां नंदा समेत अन्य देवी-देवताओं के लिए आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिलता था। तब बंड भूमियाल अपने अस्त्र-कटार से रास्ता बनाते थे। इसके बाद ही मां नंदा की यात्रा थाला उलारी, शिला समुद्र और आगे होमकुंड की ओर बढ़ पाती थी। मान्यता के अनुसार ज्यूंरागली में देवी-देवताओं को कर के रूप में कुछ न कुछ अर्पित करना पड़ता था, लेकिन बंड भूमियाल को कर नहीं देना पड़ता था। यही वजह है कि ज्यूंरागली पहुंचने पर बंड भूमियाल और मां नंदा की परंपरा से जुड़ी यह मान्यता यात्रा में विशेष भाव पैदा करती है।

शिला समुद्र में जहां नजर दौड़ाओ, शिलाएं ही शिलाएं

करीब 4,210 मीटर की ऊंचाई पर स्थित शिला समुद्र बड़ी जात का बेहद दुर्गम पड़ाव है। चारों ओर बिखरी विशाल चट्टानें और टूटे हुए पत्थरों का विस्तार इसे किसी पत्थरों के समुद्र जैसा रूप देता है। दूर तक नजर दौड़ाने पर हर तरफ शिलाएं ही शिलाएं दिखाई देती हैं। इन्हीं विशाल शिलाओं के बीच मां नंदा की बड़ी जात ने शनिवार की रात डेरा डाला।

 

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